मैं और तुम, पथिक एकही राह्के
तुम चाहती हो फ़ूलोंकी सेजपर चलना
और- मैं..
मैं इन सबसे भिन्न हूं
मैं अपनी मंजिल तय की है
यह एक पहेली है न तुम्हें?
फ़ुलोंको छू कर देखो
कांटे स्वयं ही जवाब देंगे
शुक्रवार, 6 जुलाई 2007
गुरुवार, 5 जुलाई 2007
जन्मदिन अभिलेख (१)
युग्म के ललाट की पहली रेखा
दे रहा हूं बधाई सानन्द,
जन्मदिन की अभिलेखा
'प्रतीक्षा' केवल प्रतीक्षा का संगम,
परिवर्तित हुआ इतना
नववर्षकी रजनीमें,नव तुषारका
सघन मिलन होता जितना
जीवन तेरा स्वर्णमयी हो,
बिखरा हो वसंत मधुमयी
भाग्य सर्वदा मीत तुम्हारा,
लाये उमंग हर पल नयी
फ़ले फ़ुले जीवन की बगिया,
नित फ़ुलोंका साज लिये
सजे गीत जीवन में तेरे,
नित नया झंकार लिये
मै हूं आगन्तुक व्यक्ति,
करता अभिलाषा सविशेष
अर्पित शब्दोंकी पंखुरिया,
'प्रतीक्षा' को मधुमय संदेश
जन्मदिन अभिलेख (२)
ओ! 'उषा ' रम्य रमणिक की,
तुम प्रथम अनुपम कली ।
बन प्रतीक्षा की पर्यायी,
'अशोक' दर आकर ढली।
रजनीके सिंगार में तेरी,
जीवन बेला उदित हुई।
तबसे तेरे मात-पिताने,
आनन्दित मकरंद छुई।
जीवन हो संगीत गीतमय,
भाग्य सर्वदा मीत तुम्हारा।
मात-पिता प्रिय की तुम प्यारी,
करना तुम निर्माण भी प्यारा।
फ़ागुन की रंगी क्रिडामें,
सावन का सतरंग फ़ुहारा।
शरद्काल की धूप चांदनी,
हो वसंत भी प्यारा प्यारा।
यूं 'आगन्तुक' स्नेहका, देता है वो हार।
जहां प्यार फ़ूले फ़ले, खिले प्यार ही प्यार॥
तुम प्रथम अनुपम कली ।
बन प्रतीक्षा की पर्यायी,
'अशोक' दर आकर ढली।
रजनीके सिंगार में तेरी,
जीवन बेला उदित हुई।
तबसे तेरे मात-पिताने,
आनन्दित मकरंद छुई।
जीवन हो संगीत गीतमय,
भाग्य सर्वदा मीत तुम्हारा।
मात-पिता प्रिय की तुम प्यारी,
करना तुम निर्माण भी प्यारा।
फ़ागुन की रंगी क्रिडामें,
सावन का सतरंग फ़ुहारा।
शरद्काल की धूप चांदनी,
हो वसंत भी प्यारा प्यारा।
यूं 'आगन्तुक' स्नेहका, देता है वो हार।
जहां प्यार फ़ूले फ़ले, खिले प्यार ही प्यार॥
रविवार, 1 जुलाई 2007
गीत
दर्पण भी टूट्ना सीखा
मेरे हृदय की दरारोंसे ।
खुशीयोंको कहां छिपाऊं ?
कलियोंमे या सुमनोंमे
आंसूओंको कहां छिपाऊ ?
सरिता में या झरनोंमे
झरनोंने भी झरना सीखा
मेरे नयनोंकी आसूओंसे ॥
दोस्तोंका क्या बयां करूं
वह तो बिछडे साथी हुए
जब देते दर्द शूलसा
फ़ूल पाकर भी बेईमान हुए
फ़ूलोंने भी हसना सीखा
मेरे जीवन बहारोंसे ॥
यहां कोई किसीका सगा नही
एक दुसरोंकी दुहाई देता
चिडियां भी चहकती हॆ
आसमानसे कहकर नाता
चिडियोंने भी चहकना सीखा
मेरे शब्द - गरिमासे ॥
मेरे हृदय की दरारोंसे ।
खुशीयोंको कहां छिपाऊं ?
कलियोंमे या सुमनोंमे
आंसूओंको कहां छिपाऊ ?
सरिता में या झरनोंमे
झरनोंने भी झरना सीखा
मेरे नयनोंकी आसूओंसे ॥
दोस्तोंका क्या बयां करूं
वह तो बिछडे साथी हुए
जब देते दर्द शूलसा
फ़ूल पाकर भी बेईमान हुए
फ़ूलोंने भी हसना सीखा
मेरे जीवन बहारोंसे ॥
यहां कोई किसीका सगा नही
एक दुसरोंकी दुहाई देता
चिडियां भी चहकती हॆ
आसमानसे कहकर नाता
चिडियोंने भी चहकना सीखा
मेरे शब्द - गरिमासे ॥
परिवर्तन
जिंदगीके अंधेरोंमे
जब--
मै टूटतासा जाता हूं
अपनी थकानसे
तब--
यह मायावी दुनिया
दलदलसी लगती है ।
और मै--
उसमें बिलबिलाता एक कीडा़
पर--
तुम्हारे संसर्गसे
खिल उठ्ती उजाले की किरण
दूर कहीं बादल गरजते हैं ।
कॄष्ण छाया फ़ट पड़ती
और मै--
बरसता जाता हूं
उन जल बिंदुओं की तरह
जो असहाय हैं किसी हद तक
बरसने या गिरने के लिए
मजबूर
अपने हाल पे छोडे हुये ......
जब--
मै टूटतासा जाता हूं
अपनी थकानसे
तब--
यह मायावी दुनिया
दलदलसी लगती है ।
और मै--
उसमें बिलबिलाता एक कीडा़
पर--
तुम्हारे संसर्गसे
खिल उठ्ती उजाले की किरण
दूर कहीं बादल गरजते हैं ।
कॄष्ण छाया फ़ट पड़ती
और मै--
बरसता जाता हूं
उन जल बिंदुओं की तरह
जो असहाय हैं किसी हद तक
बरसने या गिरने के लिए
मजबूर
अपने हाल पे छोडे हुये ......
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